तस्य संजनयन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्ख दध्मौ प्रतापवान् ॥
सुन कर वचन ऐसे दुर्योधन के,
खुशी उसमें उत्पन्न हो तब इसलिए।
पितामह भीष्म ने सिंह के समान,
गर्ज कर बजाया वो शंख महान् ॥
कौरवों में वृद्ध और प्रतापी पितामह भीष्म ने उस समय दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर में सिंह की दहाड के समान शंख बजाया।
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युद्ध अभी प्रारम्भ होना है। पितामह देख रहे हैं कि दुर्योधन को कई तरह की आशंकाओं, भय आदि ने घेर रखा है। वास्तविकता तो यह है कि दुर्योधन के अपने पाप, दुराग्रह ही उसे भयभीत कर रहे हैं। लेकिन तब भी समयोचित धर्म तो निभाना ही है। कौरव पक्ष में पितामह; इसलिए अब कुछ तो करना ही है। शंख के रूप में सिंह गर्जना की। अपनी प्रसन्नता से नहीं अपितु दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए-
युद्ध हो इसमें पितामह भीष्म की प्रसन्नता थी भी कहाँ और कब ? परिस्थिति बन गई, प्रतिज्ञा हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा और इसीलिए शंख बजा दुर्योधन को हर्षित करने हेतु ! पितामह भीष्म के शंखवादन के पश्चात् तो-