अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥
अजेय सेना अपनी है सब ओर से, रक्षा में जिसकी पितामह खड़े। पाण्डव सेना है जीतने में आसान, रक्षा में जिसकी है भीम बलवान् ॥
हमारी यह सेना पितामह भीष्म के द्वारा रक्षित होते हुए भी अपर्याप्त है और भीम द्वारा रक्षित पाण्डव सेना पर्याप्त है।
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दुष्वृत्तियों, संशयों आदि में रहने वाले का हृदय स्वाभाविक ही कमजोर हो जाता है। कभी वह अपनी कमजोरी दूसरे में देखेगा और अपने भीतर छिपे संशय दूसरों में। दुर्योधन की यही अवस्था है। इसीलिए उसे भीम द्वारा रक्षित पाण्डव सेना पर्याप्त दीख रही है। कारण भी है। पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है। पाण्डव सेना का समर्पण और संगठन कौरव सेना की अपेक्षा कहीं अधिक है। सही भी है। जहाँ सत्य और धर्म का पक्ष है, समर्पण भी वहीं होता है। भीम सेनापति नहीं, पाण्डवों में भी अग्रज नहीं तो भी दुर्योधन किसी और का नाम न लेकर भीम का ही नाम ले रहा है।
इसलिए क्योंकि दुर्योधन के भीतर हर समय भीम का भय बना हुआ है। वह जानता है कि मेरे द्वारा विष दिए जाने पर भी यह नहीं मरा। बात-बात में कई बार मुझे पछाड़ चुका है और फिर भीम की भरी सभा में कठोर घोर प्रतिज्ञा।
इधर नाम भीष्म पितामह का। दुर्योधन को यह बात भी आशंकित किए रहती है कि पितामह मन से हमारे साथ नहीं। मन तो इनका पाण्डवों के पक्ष में है, उसकी यही आशंका आगे के श्लोक में उसकी वाणी पर आ ही जाती है-