भाषा चुनें:

अध्याय 2 — सांख्य योग

श्लोक 57
🕉 मूल संस्कृत श्लोक

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।

नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥57॥

🕉 हिन्दी अनुवाद

📜 अनुवाद हिन्दी

💬 व्याख्या हिन्दी

Gita Prerna Logo
Go Back Top