अथ तृतीयोऽध्यायः
कर्म योग
प्रथम दो अध्यायों को चिन्तन के झरोखे से देखने का प्रयास किया गया। वस्तुतः बिना चिन्तन के गीता के तत्त्वार्थ को समझा भी नहीं जा सकता। जीवन का दर्शन है गीता प्रेरणा ! जीवन की बात है गीता, केवल किसी युग अथवा काल की नहीं। आज की, अब की और वह भी मेरी अपनी मंगलमयी प्रेरणा है श्रीमद्भगवद्गीता और इसका प्रत्येक अध्याय, प्रत्येक श्लोक, यहाँ तक कि प्रत्येक शब्द !
श्री गीता जी को ठीक से समझने के लिए इसके पूर्वापर को देखना, उस पर विचार करना भी आवश्यक है। नहीं तो कहीं-न-कहीं बुद्धि भ्रमित हो सकती है, उलझ सकती है और मनमाने अर्थ ले सकती है। यह तो निर्विवाद है कि भगवान् तो कोई बात भ्रमित करने हेतु कहेंगे नहीं। उनकी प्रेरणा तो भ्रम मिटाने के लिए है। यदि कहीं भ्रम लगता है तो अपनी नासमझी अथवा अल्पज्ञता के कारण।
द्वितीय अध्याय स्वयं में ही गीता प्रेरणाओं का एक अनूठा सार अध्याय है। इस अध्याय में श्री भगवान् ने प्रत्येक भाव दृष्टि से अर्जुन को कर्त्तव्य हेतु उत्प्रेरित करने का प्रयास किया। कहीं आत्म-अनात्म विवेक, जड़-चेतन ज्ञान, कहीं सामाजिक धरातल पर स्वभाव एवं कर्त्तव्य की बात, कहीं बुद्धि की शरण जाकर कर्म करने की स्थिति और फिर बुद्धि की स्थिरता, योग-समाधि की अवस्था।
बात तो येन-केन-प्रकारेण अर्जुन को उसके कर्त्तव्य पथ पर पुनः आरूढ़ करने की ही है। लेकिन अर्जुन को ऐसा प्रतीत हुआ मानो ये पृथक-पृथक साधन अथवा प्रेरणायें हैं। बुद्धि की स्थिरता, समता और उसमें स्थित होकर कर्म करने को अर्जुन ने ज्ञान की अवस्था मान लिया। इसीलिए द्वितीय अध्याय सम्पन्न होते ही अर्जुन अपने मन में आई बात प्रश्न के रूप में श्री भगवान् के समक्ष रखता है-
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