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अध्याय 11 — विश्वरूप दर्शन योग

श्लोक 30
🕉 मूल संस्कृत श्लोक

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ध्वलद्भिः ।

तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥30॥

🕉 हिन्दी अनुवाद


📜 अनुवाद हिन्दी


💬 व्याख्या हिन्दी


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