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अध्याय 11 — विश्वरूप दर्शन योग

श्लोक 41-42
🕉 मूल संस्कृत श्लोक

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।

अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥41 ॥


यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासन भोजनेषु ।

एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ।।42 ॥

🕉 हिन्दी अनुवाद


📜 अनुवाद हिन्दी


💬 व्याख्या हिन्दी


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