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अध्याय 11 — विश्वरूप दर्शन योग

श्लोक 48
🕉 मूल संस्कृत श्लोक

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।

एवं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ।। 48 ।।

🕉 हिन्दी अनुवाद


📜 अनुवाद हिन्दी


💬 व्याख्या हिन्दी


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