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अध्याय 4 — ज्ञान कर्म संन्यास योग

श्लोक 40
🕉 मूल संस्कृत श्लोक

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥40॥

🕉 हिन्दी अनुवाद


📜 अनुवाद हिन्दी


💬 व्याख्या हिन्दी


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