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अध्याय 4 — ज्ञान कर्म संन्यास योग

श्लोक 1-2
🕉 मूल संस्कृत श्लोक

श्री भगवानुवाच


इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।

विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।। 1।।



एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥ 2 ॥


🕉 हिन्दी अनुवाद


📜 अनुवाद हिन्दी


💬 व्याख्या हिन्दी


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